वसंत पंचमी विशेष
वसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि विचार से ज्ञान तक की पूरी यात्रा का प्रतीक है। वह दिन है जब प्रकृति, मन और बुद्धि; तीनों एक साथ खिलते हैं। बाहर सरसों के पीले फूल लहराते हैं और भीतर सोच के नये अंकुर फूटते हैं। यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने इस दिन को माँ सरस्वती के साथ जोड़ा; क्योंकि सरस्वती केवल देवी नहीं, बल्कि ज्ञान की सतत प्रवाहमान प्रक्रिया हैं।
इस भाव को जो चित्र में दर्शाया गया है, वह अत्यंत गहरा और शिक्षाप्रद है। चित्र के सबसे नीचे छोटा-सा त्रिकोण है; विचार का बीज। हर बड़ा परिवर्तन, हर खोज, हर रचना यहीं से शुरू होती है। एक प्रश्न, एक जिज्ञासा, एक हल्की-सी हलचल। यह बीज कमजोर दिखता है, पर इसी में भविष्य छिपा होता है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ यही है; इस बीज को पहचानना और उसे मरने न देना। जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते हैं, त्रिकोणों की परतें फैलती जाती हैं। यह सीखने की प्रक्रिया है; अनुभव, अभ्यास, अनुशासन और धैर्य। विचार यहाँ आकार लेता है, स्पष्ट होता है, मजबूत बनता है। यह हमें सिखाता है कि ज्ञान एक दिन में नहीं आता; वह समय, श्रम और निरंतरता माँगता है। हार, असफलता और भ्रम भी इसी रास्ते के हिस्से हैं, रुकावट नहीं। इसके बाद चित्र में घुमावदार रेखाएँ उभरती हैं; यह अभिव्यक्ति है। विचार अब शब्द बनता है, ध्वनि बनता है, चित्र, संगीत और संकेत बनता है। जो भीतर था, वह बाहर आने लगता है। यही सरस्वती का स्वरूप है; वाणी, कला और सृजन। जब विचार व्यक्त होता है, तभी वह समाज से जुड़ता है। सबसे ऊपर फैलती रेखाएँ ज्ञान की नदी हैं। अब ज्ञान व्यक्ति का नहीं रहता, वह बहने लगता है; पीढ़ियों तक, समाज तक, भविष्य तक। शिक्षक, लेखक, कलाकार और वैज्ञानिक इसी नदी के वाहक हैं।
वसंत पंचमी हमें यही सिखाती है कि अगर आज हार मिली है, तो वह बीज के मिट्टी में दबने जैसा है। सही समय आने पर वही बीज अंकुर बनेगा। माँ शारदे से प्रार्थना यही है कि वे हमें धैर्य दें, स्पष्ट सोच दें और अपने भीतर छिपे विचार को ज्ञान की नदी तक पहुँचाने की शक्ति दें। यही इस पर्व का सत्य, सौंदर्य और संदेश है।
Reviewed by AkT
on
जनवरी 23, 2026
Rating: 5

