राम की महिमा
वाल्मीकि की अनुपम कथा में राम केवल कर्तव्य के पथिक नहीं हैं, वे उस व्यूह के शिल्पी हैं जो मनुष्य को आत्मिक अनुशासन, नीतिशुद्धि और करुणा की ओर ले जाता है। उपनिषदों की गूढ़ता कहती है - “आत्मा का स्वरूप शुद्ध है”, और राम उस शुद्धतम स्वरूप की सजीव अभिव्यक्ति हैं। उनका जन्म केवल एक राजकुमार के रूप में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और प्रेम के साक्षात् प्रतीक के रूप में हुआ। वे त्रेता के उस युग में प्रकट हुए जब अधर्म, असंतुलन और अहंकार ने समाज को विषाक्त कर दिया था। राम उस काल के नहीं, हर काल के उत्तर हैं; वे वह उत्तर हैं जो मनुष्य को उसके भीतर के ईश्वर से परिचित कराता है। बचपन से ही उनमें असाधारण संयम और शालीनता झलकती थी। उन्होंने धनुर्विद्या सीखी, पर हथियार को क्रोध का साधन नहीं, धर्म का औजार माना। जब पिता दशरथ ने उन्हें वनवास का वचन सुनाया, तब उन्होंने बिना क्षणभर संकोच के सिर झुका दिया। उन्होंने राज्य नहीं, कर्तव्य चुना; सुख नहीं, सत्य को अपनाया। वह क्षण इतिहास का नहीं, आत्मा का था -जहाँ एक पुत्र ने पिता से बड़ा धर्म स्वीकारा।
राम हँसे, रोए, लड़े, क्षमा की, त्याग किया - ताकि मनुष्य यह समझ सके कि ईश्वरत्व किसी चमत्कार में नहीं, मर्यादा में है। उनका चरित्र कहता है, “ईश्वर वही है जो मनुष्य होकर भी मर्यादा में रहे।” यही रामत्व है - शक्ति में विनम्रता, ज्ञान में प्रेम, और कर्म में धर्म। जब मनुष्य के भीतर यह रामत्व जाग उठे, तब संसार फिर से प्रकाशमान हो जाता है। क्योंकि राम कोई कथा नहीं, एक चेतना हैं - जहाँ सत्य है, वहाँ राम हैं; जहाँ करुणा है, वहाँ राम हैं; जहाँ मर्यादा है, वहाँ साक्षात् श्रीराम हैं।
Reviewed by AkT
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दिसंबर 17, 2025
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