सुकून का रास्ता भीतर से होकर गुजरता है
कभी ध्यान दीजिएगा, रात को सोने से पहले हमारा मन कितनी दूर-दूर तक भटकता है। किसी ने क्या कहा, कोई हमारे बारे में क्या सोचता होगा, कल क्या होगा, बीते हुए कल में क्या बदल सकते थे- मन एक ही रात में न जाने कितनी यात्राएँ कर आता है। सुबह आँख खुलती है, तो समस्याएँ वहीं खड़ी मिलती हैं, लेकिन थकान रात भर की साथ चली आती है।
हम अक्सर उन दरवाज़ों पर दस्तक देते रहते हैं, जिनके दूसरी तरफ की चाबी हमारे पास होती ही नहीं। हम चाहते हैं कि लोग हमारी भावनाएँ समझें, परिस्थितियाँ हमारी इच्छा के अनुसार बदलें और जीवन हर मोड़ पर हमारी योजना का पालन करे। मगर जीवन कोई ऐसी सड़क नहीं, जिसे हम अपने मनचाहे रास्ते पर मोड़ सकें। यहाँ धूप भी मिलेगी, अचानक बारिश भी होगी और कभी-कभी बिना किसी गलती के भी रास्ता बदलना पड़ेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि कोशिश करना छोड़ दिया जाए। अर्थ केवल इतना है कि जहाँ हमारा प्रयास संभव है, वहाँ पूरी ईमानदारी से प्रयास करें; और जहाँ निर्णय, व्यवहार या परिणाम हमारे अधिकार में नहीं हैं, वहाँ स्वयं को बार-बार कटघरे में खड़ा करना बंद करें। किसी अपने की नाराज़गी, बीते समय की भूल या आने वाले कल की अनिश्चितता को सोचते-सोचते आज का दिन खो देना वैसा ही है, जैसे छतरी होने के बावजूद बारिश से डरकर घर में बैठे रहना और बाहर खिले फूलों को देखने का अवसर भी गँवा देना।
ज़िंदगी हर सवाल का जवाब उसी दिन नहीं देती। कुछ बातें समय समझाता है, कुछ अनुभव और कुछ का उत्तर कभी मिलता ही नहीं। हर अनसुलझी बात को अपने मन पर बोझ बनाकर ढोना भी ज़रूरी नहीं। सुकून तब नहीं आता, जब जीवन में चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं; वह तब आता है, जब हम हर चिंता को अपनी ज़िंदगी पर हुकूमत करने का अधिकार देना छोड़ देते हैं।









