“मातृभाषा परं दैवम्, मातृभाषा परं सुखम्।” — मातृभाषा स्वयं देवत्व है, वही आनंद और गौरव का स्रोत है।14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया।
अभिषेक त्रिपाठी
(अयोध्या, उ.प्र.)
“मातृभाषा परं दैवम्, मातृभाषा परं सुखम्।” मातृभाषा स्वयं देवत्व है, वही आनंद और गौरव का स्रोत है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया। तभी से यह तिथि हमें स्मरण कराती है कि भाषा केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का स्वर है। जिस प्रकार गीता कहती है “वाणी ही मनुष्य का परिचय है”, उसी प्रकार हिन्दी हमारे राष्ट्र की आत्मा का परिचय है।
हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि "गंगा-जमुनी तहज़ीब" का वह विराट प्रवाह है जिसमें वेदों का उच्चार, रामायण की चौपाइयाँ, कबीर के दोहे और तुलसी की वाणी साथ-साथ बहते हैं। तुलसीदास ने लिखा, "कवित्त जनि कवित्त कहउँ कवित्त समुझि विचारि। सारिंग सर सरित सरस रस रसना रस धारि॥" भाषा तभी जीवित है, जब वह रसधारा की तरह समाज के जीवन में बहती रहे। महाभारत में युधिष्ठिर ने भीम से कहा था – “शब्द ही धन है, शब्द ही व्रण है।” सच है, शब्द सभ्यता की नींव हैं और भाषा संस्कृति का जीवित शरीर। यदि हम अपनी भाषा से विमुख हो जाएँ तो मानो आत्मा से ही विमुख हो गए।
आज हिन्दी तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, परंतु अंग्रेज़ी का अतिक्रमण उसे भीतर से खोखला कर रहा है। यह स्थिति वैसी ही है जैसे "स्वर्णमृग" के पीछे दौड़कर राम को सीता का वियोग सहना पड़ा। पश्चिम के दार्शनिक विट्गेंस्टाइन ने कहा था – "द लिमिट्स ऑफ माय लैंग्वेज मीन द लिमिट्स ऑफ माय वर्ल्ड।" यदि हम अपनी भाषा खो देंगे तो अपना संसार खो देंगे। फिल्म लगान का वह संवाद याद आता है – “भाषा तो दिल से निकलने वाली आवाज़ है, उसमें ताक़त है।” सचमुच, भाषा यदि दिल से निकले तो वह पीढ़ियों तक अमर रहती है।
इसलिए हिन्दी दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन है। यह स्मरण दिलाता है कि "वाणी वह शस्त्र है, जो बिना रक्त बहाए क्रांति कर सकती है।" आइए, हम सब मिलकर इस अमूल्य धरोहर को बचाएँ, क्योंकि भाषा का अस्तित्व ही हमारी पहचान है, हमारी आत्मा है, और हमारी स्वतंत्रता का भविष्य भी।
तथ्य:-
14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत संघ की राजभाषा होगी और इसकी लिपि देवनागरी होगी। यह निर्णय भारतीय संविधान के भाग-17 के अनुच्छेद 343(1) में शामिल किया गया। संयोग से यही दिन हिन्दी के महान साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्मदिन भी था। इसलिए इस तिथि को विशेष महत्व मिला। वर्ष 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। यह भी उल्लेखनीय है कि 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी को जनमानस की भाषा और राजभाषा बनाने का आह्वान किया था। हिन्दी दिवस हर वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 1949 में जब यह निर्णय लिया गया था। वर्ष 1953 से लगातार 14 सितम्बर को पूरे देश में इसे मनाने की परंपरा है।
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