तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात्, अंधकार से प्रकाश की ओर... उपनिषद् की यह पुकार दीपावली के उत्सव में साकार होती प्रतीत होती है। यह केवल दीपों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा का आलोकोत्सव है।

अभिषेक त्रिपाठी
(अयोध्या, उ.प्र.)
“तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात्, अंधकार से प्रकाश की ओर... उपनिषद् की यह पुकार दीपावली के उत्सव में साकार होती प्रतीत होती है। यह केवल दीपों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा का आलोकोत्सव है। जैसे भगवान राम चौदह वर्षों का वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे, वैसे ही हर हृदय अपने भीतर के रावण अहंकार, क्रोध, लोभ को पराजित कर प्रकाश की ओर अग्रसर हो सकता है। कबीर ने कहा है “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
दीपक की लौ यही सिखाती है, पहले स्वयं के अंधकार को पहचानो। 


महाभारत में अर्जुन को कृष्ण ने गीता का संदेश दिया, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...” जीवन में जब-जब धर्म, सत्य और प्रकाश कमजोर पड़ते हैं, तभी दीपावली सा नया सवेरा जरूरी हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो दीप का प्रकाश केवल आलोक नहीं, ऊर्जा, उष्मा और आशा का प्रतीक है। मशहूर वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने जब बल्ब का आविष्कार किया, तब कहा था “I have not failed. I've just found 10,000 ways that won't work.” यही जिद, यही जिजीविषा दीपावली की लौ में जलती है। हाफ़िज़ की पंक्ति याद आती है “हर एक रात के बाद सुबह होती है।” आओ दीप जलाएँ, पर केवल मिट्टी के नहीं, मन के भी। प्रेम का, करुणा का, और आत्मचिंतन का।

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