तनाव, दुःख, चिंता – ये तब तक ही भारी होते हैं जब तक हम उन्हें छोड़ना नहीं जानते।
अभिषेक त्रिपाठी
(अयोध्या, उ.प्र.)
एक मनोवैज्ञानिक ने एक जल से भरा गिलास छात्रों के सामने उठाया और पूछा, “कितना भारी है?” उत्तर आया – कुछ औंस से लेकर कुछ पाउंड तक। परंतु वह बोला, “महत्व इसका वज़न नहीं, बल्कि यह है कि मैं इसे कितनी देर तक पकड़ कर रखता हूं।” यही बात जीवन के तनावों पर भी लागू होती है। जीवन की गति में, जब थकान शरीर में नहीं, मन में उतरने लगे, तो समझना चाहिए कि हम उस अदृश्य भार को ढो रहे हैं जो हमारे कंधों के लिए नहीं, आत्मा के लिए भारी है।
एक किंवदंती है कि सिकंदर जब भारत आया, तो उसने एक संन्यासी से कहा – “मांगो, क्या चाहिए?” संन्यासी मुस्कराया और बोला – “बस हट जा, तू मेरी धूप रोक रहा है।” उस एक उत्तर में संसार की सारी सांसारिक आकांक्षाओं और तनावों का निषेध छिपा है। वेस्टर्न मनोविज्ञान में भी, Cognitive Behavioral Therapy (CBT) जैसी विधियाँ हमें सिखाती हैं कि नकारात्मक विचारों को पकड़ कर रखने से ही चिंता जन्म लेती है। ठीक वैसे ही जैसे उस जल से भरे गिलास को देर तक पकड़े रहना थकान को जन्म देता है।
अतः जब अगली बार जीवन का कोई गिलास भारी लगे, तो यह न सोचिए कि उसे कितनी देर तक थामा जा सकता है, बल्कि यह जानिए कि समय पर उसे नीचे रख देना भी बुद्धिमत्ता है। यही मानसिक स्वास्थ्य है, यही आध्यात्मिक उन्नति।


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