26 जनवरी : एक तिथि नहीं, भारतीय गणतंत्र की चेतना

वसंत पंचमी विशेष

संतुलन कोई तपस्या नहीं, यह रोज़मर्रा की समझ है।

राम की महिमा

जो स्वयं अंधकार में रहता है, वही रोशनी देखकर आँखें सिकोड़ता है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात्, अंधकार से प्रकाश की ओर... उपनिषद् की यह पुकार दीपावली के उत्सव में साकार होती प्रतीत होती है। यह केवल दीपों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा का आलोकोत्सव है।

“मातृभाषा परं दैवम्, मातृभाषा परं सुखम्।” — मातृभाषा स्वयं देवत्व है, वही आनंद और गौरव का स्रोत है।14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिया।

कृष्ण केवल एक देवता नहीं, वे जीवन के शाश्वत संगीत हैं।

जीवन का प्रथम और अंतिम उद्धारक स्वयं हम ही हैं।

तनाव, दुःख, चिंता – ये तब तक ही भारी होते हैं जब तक हम उन्हें छोड़ना नहीं जानते।

जीवन, एक यात्रा है — मोह से मोक्ष तक

सच्ची मुक्ति जंगलों में नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन में है।

अयोध्या परिक्रमा विशेष

तांडव तो बस शिव कर सकते हैं। सचमुच, शिव का नृत्य अनन्त प्रतीक है; दर्शन भी, कला भी, विज्ञान भी।

क्या कोई व्यक्ति परिपूर्ण (परफेक्ट) होता है?

ईश्वर नियम है, और नियम ही ईश्वर। यही ज्ञान, यही मुक्ति, यही सत्य है।

माता, पिता और आचार्य - ये तीन स्तंभ हैं जिन पर मनुष्य के अस्तित्व का आधार टिका है।

अल्फा मैन बनाम कम्पलीट मैन : योद्धा वही, जो केवल रण जीतना नहीं, हृदय भी जीतना जाने।

मसल्स (स्नायु) तभी मज़बूत होते हैं जब उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।

शिक्षक दिवस केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस ऋषि-परंपरा के प्रति हमारी कृतज्ञता है, जिसने अंधकार से प्रकाश की ओर पथ प्रशस्त किया।

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